वास्तु क्या है?
भवन-निर्माण और बनावट का एक प्राचीन भारतीय शास्त्र। इसके पीछे विचार यह है कि आपका घर आपकी ज़िंदगी पर असर डालता है, इसलिए कमरों का इंतज़ाम, दरवाज़े, पलंग की दिशा और रंगों का चुनाव, सबका महत्व है।

वास्तु बनावट की एक पारंपरिक पद्धति है। यह दिशा, कमरों के इस्तेमाल, आने-जाने के रास्तों, रोशनी और पंचतत्व से जुड़े प्रतीकात्मक विचारों को एक साथ जोड़ती है।
घर को परखने के लिए इसे एक व्यवस्थित तरीके की तरह इस्तेमाल करें। शुरुआत दिशा, कमरों के इस्तेमाल, आने-जाने के रास्तों, रोशनी और खुले बीच वाले हिस्से से करें।
पंचतत्व
वास्तु पाँच मूल तत्वों के साथ काम करता है। हर तत्व के अपने गुण हैं, और कुछ दिशाएँ ऐसी हैं जहाँ वह सबसे अच्छा काम करता है।
आठ दिशाएँ
हर दिशा का अपना स्वभाव और अपना काम है।
| दिशा | स्वभाव |
|---|---|
| उत्तर | परंपरा में इसे बढ़त, समृद्धि, जल और बुध ग्रह से जोड़ा जाता है। वास्तु की कुछ परंपराएँ काम-धंधे और व्यापार के लिए उत्तरमुखी प्रवेश द्वार को अच्छा मानती हैं। |
| ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) | परंपरा में इसे समृद्धि और साधना से जोड़ा जाता है। वास्तु की कई परंपराएँ यहाँ पूजा घर या ध्यान की जगह को अच्छा मानती हैं। |
| पूर्व | परंपरा में इसे सूर्योदय, नई शुरुआत और चहल-पहल से जोड़ा जाता है। वास्तु की कई परंपराएँ यहाँ प्रवेश द्वार और दिन में इस्तेमाल होने वाले कमरों को अच्छा मानती हैं। |
| आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्व) | परंपरा में इसे अग्नि और बदलाव से जोड़ा जाता है। वास्तु की कई परंपराएँ यहाँ रसोई को अच्छा मानती हैं। |
| दक्षिण | परंपरा में इसे स्थिरता, अग्नि और मज़बूत ढाँचे से जोड़ा जाता है। वास्तु की कुछ परंपराएँ यहाँ भारी फ़र्नीचर या बेडरूम को अच्छा मानती हैं। |
| नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) | परंपरा में इसे पृथ्वी तत्व, स्थिरता और आराम से जोड़ा जाता है। वास्तु की कई परंपराएँ यहाँ मास्टर बेडरूम को अच्छा मानती हैं। |
| पश्चिम | पूर्णता और ठहरकर सोचने की दिशा। यहीं दिन ढलता है, इसलिए आराम की जगहों और मेहमानों के हिस्से के लिए यह अच्छी है। पर पश्चिम का असर ज़रूरत से ज़्यादा हो, तो ठहराव और सुस्ती आ सकती है। |
| वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम) | सहारे और मददगार लोगों से जुड़ाव की दिशा। यहाँ वायु तत्व का बहाव रहता है, इसलिए गेस्ट रूम और प्रवेश के गलियारों के लिए यह आदर्श है। यह आवाजाही और बदलाव में मदद करती है। |
बुनियादी सिद्धांत
ब्रह्मस्थान पवित्र है। आपके घर का बीच का हिस्सा ब्रह्मस्थान है। इसे खुला, साफ़ और सामान से ख़ाली रखें, क्योंकि ऊर्जा यहीं इकट्ठा होती है। यह जगह घिर जाए, तो ऊर्जा बह नहीं पाती।
बहाव के साथ चलें। ऊर्जा ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) से नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) की ओर बहती है। आदर्श रूप से आपका प्रवेश द्वार उत्तर-पूर्व या पूर्व में होना चाहिए। भारी चीज़ें दक्षिण और दक्षिण-पश्चिम में रखें, हल्की चीज़ें उत्तर और उत्तर-पूर्व में।
तत्वों में संतुलन रखें। आपके घर में पाँचों तत्वों का मेल होना चाहिए। दक्षिण-पूर्व की रसोई (अग्नि) को संतुलित करने के लिए उत्तर में जल तत्व चाहिए। दक्षिण के बेडरूम (पृथ्वी) को पूर्व की खिड़कियों से आती हवा चाहिए।
सबसे पहले प्रवेश द्वार देखें। वास्तु के कई तरीके इसकी दिशा और बाहरी दीवार पर इसकी ठीक जगह से शुरुआत करते हैं। देखें भाग 6।
बदलाव सोच-समझकर करें। पहले समझें कि किसी जगह के पीछे परंपरा की क्या वजह है, फिर आने-जाने, रोशनी, हवा और सुरक्षा जैसी व्यावहारिक ज़रूरतें भी जाँच लें।